रचना क्र. 52
मुसाफिर जागते रहना नगर मेंं चोर आते हैं
श्री ब्रह्मानंद (पुष्कर) · null
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मुसाफिर जागते रहना नगर मेंं चोर आते हैं ॥धृ॥
संभालो माल अपने को
बांधकर धर सिराने में ।
जरासी नींद गफलत में
झपट गठडी उठाते हैं ॥१॥
कपट का है यहाँ चलना
सबी व्यापार दिनराती ।
दिखाकर मूरतें सुंदर
जाल में वो फसाते हैं ॥२॥
कबी किस का नहीं करना
भरोसा इस जगा दिल में ।
लगाकर प्रीत मतलब से
फेर पल में हटाते हैं ॥३॥
ठिकाना हैं नहीं कायम
किसी का इस सराये में ।
वो ‘ब्रह्मानंद’ दिनदिन में
सबी चलचल के जाते हैं ॥४॥
