रचना क्र. 3
नश्वर सब संसार
श्री ब्रह्मानंद (पुष्कर)
मनुवा सोचसमझकर देखले रे
नश्वर सब संसार ॥धृ॥
राजा जावे रानी जावे
जावे सब परिवार ॥
महल खजाना सब चल जावे
जावे घर दरबार ॥१॥
सूरज चाँद सितारे पर्वत
सागर नीर अपार ॥
दिन दिन काल सबी को खावे
धावे पवन सवार ॥२॥
बालपना जोबन सब बीता
बीता कामबिहार ॥
मौत खडी सिर ऊपर तेरे
अब तो चेत गँवार ॥३॥
प्रभुका नाम सुमर निशिबासर
छोड जगत व्यवहार ॥
‘ब्रह्मानंद’ मिटे भवबंधन
छूटे सकल बिकार ॥४॥
