रचना क्र. 466
जो भजे हरि को सदा
श्री ब्रह्मानंद, पुष्कर
जो भजे हरि को सदा सोई परमपद पाएगा ॥धृ॥
देह के माला तिलक अरु छाप नहि किसु कामके ।
प्रेमभक्तिके बिना नहि नाथ का मन भायगा ॥१॥
दिलके दर्पणको सफा कर दूर कर अभिमानको ।
खाक हो गुरुके कदमकी तो प्रभु मिल जायगा ॥२॥
छोड दुनियाके मजे सब बैठकर एकांतमे ।
ध्यान धर हरिके चरणका फिर जनम नहि आयगा ॥३॥
दृढ भरोसा मन मे करके जो जपे हरिनाम को ।
कहता है ब्रह्मानंद ब्रह्मानंद बीच समायगा ॥४॥
