रचना क्र. 92
अहो प्रभु काल बडो बलकारी
श्री ब्रह्मानंद (पुष्कर)
अहो प्रभु काल बडो बलकारी ।
जांको भोजन है नरनारी ॥धृ॥
ब्रह्मा रुद्र इन्द्रगण खाये,
खाये दैत्य हजारी ।
बडे बडे पृथ्वी के राजा,
खाये जिमि तरकारी ॥१॥
सूरज चाँद सितारे नदियाँ,
सागर पर्वत भारी ।
कालचक्र में सब पिस जावें,
अपनी अपनी बारी ॥२॥
जलचर नभचर वनचर भूचर,
लघुदीर्घ तनधारी ।
सबही जीव काल के मुख में,
घूम रहे दिनचारि ॥३॥
नाम तुम्हारो अमर निरंतर,
कालपाशभयहारी ।
‘ब्रह्मानंद’शरण में तेरी,
कीजिये भवजल पारी ॥४॥
