रचना क्र. 105
रघुवर तुमको मेरी लाज
श्री तुलसीदास महाराज
रघुवर तुमको मेरी लाज ॥धृ॥
सदा सदा मैं शरणतिहारो,
तुम बडे गरीब नवाज ॥१॥
पतितउधारन बिरुद तिहारो,
श्रवणन सुनी आवाज ॥२॥
हौं तो पतित पुरातन कहिए,
पार उतारो जहाज ॥३॥
अघखंडन दुखभंजन जन के,
यहीं तिहारो काज ॥४॥
तुलसीदास पर किरपा करिये,
भक्तिदान देहु आज ॥५॥
