रचना क्र. 118
गुरुकृपांजन पायो रे भाई
श्री कबीर
गुरुकृपांजन पायो रे भाई ।
रामबिना कछु देखत नाही ॥१॥
अंदर राम बाहिर राम ।
जहाँ देखे वहाँ पूरनकाम ॥२॥
जागत राम सोवत राम ।
सपनों में देखत राजा ही राम ॥३॥
कहत कबीरा अनुभव निका ।
जहाँ देखे वहाँ रामसरिखा ॥४॥
© 2026 साधननंदादीप — डॉ. सुहास पेठे. सर्व हक्क राखीव.
रचना क्र. 118
श्री कबीर
गुरुकृपांजन पायो रे भाई ।
रामबिना कछु देखत नाही ॥१॥
अंदर राम बाहिर राम ।
जहाँ देखे वहाँ पूरनकाम ॥२॥
जागत राम सोवत राम ।
सपनों में देखत राजा ही राम ॥३॥
कहत कबीरा अनुभव निका ।
जहाँ देखे वहाँ रामसरिखा ॥४॥