रचना क्र. 213
मन की बात न मानो साधो
श्री ब्रह्मानंद, पुष्कर
मन की बात न मानो साधो ॥धृ॥
मन चंचल मर्कटसम निशिदिन,
रहे न एक ठिकानो रे ।
चिंतन करत सदा विषयन को
माया भरम भुलानो रे ॥१॥
तन धन सुत दारा के माही,
रात दिवस लपटानो रे ।
मोहमयी मदिरा को पीकर
फिरत सदा मस्तानो रे ॥२॥
लाभ हानि नहीं समझे मूरख,
करे जो मन को मानो रे ।
सो जन कबहूँ मोक्ष नहीं पावे
जन्ममरण भटकानो रे ॥३॥
रोक जतन से मन विषयन से,
हरि चरणन में आनो रे ।
‘ब्रह्मानंद’ कटे भवबंधन
यह निश्चय कर जानो रे ॥४॥
